Welcome To स्वप्नलोक का पनघट

All The Poems Here Are Composed By Abhay Singh

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Friday, 15 November 2013

सन्नाटा


सन्नाटा



नगर के दूसरे छोर पर सन्नाटा फैला है, नितांत सन्नाटा।
गलियों में, सड़कों पर, मौन का राज्य स्थापित है।
लोग आते-जाते हैं, फिर भी सन्नाटा है! आखिर क्यों?
क्या एकसाथ सभी मनुष्यों ने मौन धारण कर लिया है?
नहीं, दूर वहां पूरब दिशा के गांवों की सरहदों पर, कुछ लोग प्रेम व्यक्त कर रहे हैं।
अभी वहाँ पहुवा का झोका नहीं पहुंचा है।

Your Love

Your Love



O my heart's ruler,
Creating resonance is not my contemplative, though
I know not from which distant time you ever came to me
But I know why my heart feels tremulous joy.
I know not to whome give the chance to meet my heart
But I know why my heart is pondering over you
I know not who and where are you
But I feel in the air a deep smell me your presence
I know not why is this so........
But I know.........
Yes, I know this is nothing but
Your Love.

ग्रीष्म


ग्रीष्म



धूप जले आंगन में कलियां
बिखर रहीं गुलमोहर की
चला गया ऋतुराज तो क्या?
अब माटी महक रही घर की
सूख गईं नदियां और सरवर
सूख गये कुसुमाकर सब
हरे दूब हो गये हैं धूसर 
पत्ते हरे खड़कते हैं अब
सांय-सांय चलती पुरवाई
सूरज गल के बरस रहा
चारो ओर उदासी छाई
चातक जल को तरस रहा
धूल भरे नैनों में आंधी
अनयास ही मेघ दिखाये
ऋतु की रेश्मी डोर से बांधी
मोती है ये ग्रीष्म बताये।


Thursday, 14 November 2013

कृष्ण छवि


कृष्ण छवि




माथे किरीट मोरपखा कै।

उर पै शोभन वनमाला है॥

नटखट हँसत चलत पगुधारी।

सोहत ज्योँ अवध मेँ खरारी॥

माखन चोर कहावत वे हैँ।

श्रृष्टि रचना करावत जो हैँ॥

जमुना तीर बजावैँ मुरली।

मनो जगत रतिपति वश कर ली॥

ग्वाल-बाल संग खेलत मोहैँ।

जैसे सक्र सुरन्ह बिच सोहैँ॥

अंगुरिप अचल सोह है कैसे।

वामन नापैँ धरती जैसे॥

गोपिन के संग रास रचावै।

मनो अवध में बजै बधावै॥

अहो मनोहर मुरली वाले।

जसोमती और नंद दुलारे॥

बसौ आइ उनके मन माही।

जे सतकर्म सतपंथ के राही॥


कृष्ण छवी रश्मि लागे, यह जग तम की जननी

निरख रूप उजास होय, ज्यों दीपक की अग्नि