Thursday, 14 November 2013

कृष्ण छवि


कृष्ण छवि




माथे किरीट मोरपखा कै।

उर पै शोभन वनमाला है॥

नटखट हँसत चलत पगुधारी।

सोहत ज्योँ अवध मेँ खरारी॥

माखन चोर कहावत वे हैँ।

श्रृष्टि रचना करावत जो हैँ॥

जमुना तीर बजावैँ मुरली।

मनो जगत रतिपति वश कर ली॥

ग्वाल-बाल संग खेलत मोहैँ।

जैसे सक्र सुरन्ह बिच सोहैँ॥

अंगुरिप अचल सोह है कैसे।

वामन नापैँ धरती जैसे॥

गोपिन के संग रास रचावै।

मनो अवध में बजै बधावै॥

अहो मनोहर मुरली वाले।

जसोमती और नंद दुलारे॥

बसौ आइ उनके मन माही।

जे सतकर्म सतपंथ के राही॥


कृष्ण छवी रश्मि लागे, यह जग तम की जननी

निरख रूप उजास होय, ज्यों दीपक की अग्नि

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